मनोरंजन के पर्दे पर ऐसे दिखते हैं भगवान बुद्ध

मनोरंजन के पर्दे पर ऐसे दिखते हैं भगवान बुद्ध

भगवान बुद्ध पर निर्मित फिल्में और उनका स्वरूप

सुरजीत कुमार सिंह

प्राचीनकाल से ही संसार के अनेक देश के विद्वानों, सत्य की खोज करने वाले जिज्ञासुओं और कलाकारों व चित्रकारों को भगवान बुद्ध का ऐतिहासिक अलौकिक व्यक्तित्व और जीवनवृत्त सदैव आकर्षित करता रहा है। साथ ही तथागत गौतम बुद्ध के उपदेशों के रूप में दिया गया बौद्ध धम्म और उनसे जुड़े पुरातत्व महत्व के ऐतिहासिक स्थल, सारी दुनिया के लिए सदैव आकर्षण व भ्रमण का केंद्र रहे हैं। उन सब पर जैसा जिस किसी व्यक्ति की समझ में आया है, उसने अपने-अपने तरीके से योगदान दिया है। जैसे किसी ने उन पर गंभीर शोध किया है, किसी ने उन पर विद्वतापूर्ण किताबें लिखी हैं, किसी ने उन पर कहानी-कविताएँ और उपन्यास लिखे हैं, किसी ने अजंता और एलोरा की महान गुफाओं से प्रेरणा लेकर चित्रकारी की है, किसी ने विश्व शांति के प्रतीक सांची के स्तूप से मूर्तिकला को समझने, समझाने व गढ़ने का प्रयास किया है और जब फिल्मों का चलन आरंभ हुआ तो फिल्मकारों ने भगवान बुद्ध के अलौकिक व्यक्तित्व और जीवनवृत्त पर वृत्तचित्र बनाने, धारावाहिक बनाने, फिल्म बनाने का कार्य किया है। इसके साथ ही बुद्ध के प्रति फिल्मी जगत का आकर्षण इस कदर बढ़ा कि अब उन पर एनिमेशन तकनीक और कार्टून वाली फिल्में बनाई जाने लगी हैं।

पूरी दुनिया में और भारतीय सिनेमा के इतिहास में भगवान बुद्ध के ऊपर कई फिल्में बनीं हैं। जैसे 1923 में भारत में पहली फिल्म भारतीय सिनेमा के प्रणेता व शिखर पुरुष दादा साहब फाल्के ने ‘बुद्धदेव’ के नाम से बनाई थी। यह फिल्म तथागत गौतम बुद्ध के जीवन चरित्र के बारे में थी, जो एक मूक फिल्म थी और इसको हिंदी में ‘बुद्धदेव’ के नाम से और अंग्रेजी में ‘लार्ड बुद्धा’ के नाम से प्रदर्शित किया गया था। अन्ना सालुंके ने इसमें अभिनय किया था। इसके निर्माता और निर्देशक दादा साहब फाल्के ही थे।

दादा साहब फाल्के के गौतम बुद्ध पर फिल्म बनाने के दो वर्ष बाद सन 1925 में प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक व अभिनेता हिमांशु राय और जर्मन फिल्मकार ‘फ्रांज ओस्तेन’ ने मिलकर भगवान बुद्ध के जीवन पर ‘दी लाइट ऑफ एशिया’ नामक महत्वपूर्ण मूक फिल्म अंग्रेजी नाम से निर्देशित की। जिसमें स्क्रीनप्ले का काम निरंजन पाल ने किया था। यह फिल्म सन 1891 में थियोसोफिकल सोसाइटी द्वारा प्रकाशित महान ब्रिटिश कवि ‘सर एडविन अर्नोल्ड’ की बुद्ध के जीवन पर काव्य में लिखी विश्व प्रसिद्ध कृति ‘दी लाइट ऑफ एशिया’ के ऊपर आधारित थी। इस फिल्म में गौतम बुद्ध के जीवन की घटनाओं को कुछ जगह रोमांटिक तरीके से दिखाया गया था। कुल 97 मिनट की यह फिल्म 22 अक्टूबर,1925 को पहली बार जर्मनी में प्रदर्शित की गई थी और सारे यूरोप में इसे खूब प्रसिद्धि मिली, इसके बाद यह फिल्म भारत में ‘प्रेम संन्यास’ के नाम से मूक फिल्म के रूप में प्रदर्शित की गई थी। इस फिल्म के नाम ‘प्रेम संन्यास’ से अभिप्राय, यह एक ऐसे राजकुमार की कहानी से है जो सांसारिक दुःखों को दूर करने के लिए संन्यास से प्रेम करने लगता है। इस फिल्म में हिमांशु राय ने राजकुमार सिद्धार्थ गौतम बुद्ध की मुख्य भूमिका निभाई थी और बाकी अन्य अभिनय करने वाले लोगों में सीता देवी, सुनालिनी देवी, मृणालिनी देवी, मधु बोस, सुशील घोष, प्रफुल्ल राय और एकोम्बी विल्हेम टोंगो आदि शामिल थे।

‘दी लाइट ऑफ एशिया’ नामक महत्वपूर्ण मूक फिल्म बनने के लगभग 27 वर्ष बाद तक भारत या दुनिया के किसी भी देश में गौतम बुद्ध के ऊपर फिल्म निर्माण नहीं हुआ था। काफी लंबे अंतराल के बाद जापान की फिल्म निर्माता कंपनी ‘देएई एईगा’ ने जापानी फिल्म निर्देशक ‘तीनुसुकी किनुगासा’ के साथ मिलकर भगवान बुद्ध के जीवन पर ‘डेडीकेसन ऑफ दी बुद्धा’ नामक फीचर फिल्म का निर्माण किया था, जो 20 मार्च, 1952 को प्रदर्शित की गई और यह फिल्म इतनी मेहनत से बनाई गई थी कि इसे सन 1953 के कान्स फिल्म समारोह के लिए नामांकित किया गया था।

भगवान बुद्ध की 2500 वीं जयंती के पावन अवसर पर भारत सरकार ने बुद्ध पर एक फिल्म बनाने का निर्णय लिया और वर्ष 1957 में महान भारतीय फिल्मकार बिमल राय द्वारा निर्मित ‘गौतम दी बुद्धा’ नामक वृतचित्र को भारत सरकार ने रिलीज किया। इस डॉक्यूमेंट्री फिल्म के लेखक व निर्देशक राजबंस खन्ना थे। यह फिल्म बहुत ही व्यापक तरीके और शोधपूर्ण ढँग से बनाई गई थी, जिसमें श्वेत-श्याम तस्वीरों के साथ प्राकृतिक वातावरण में फिल्मांकन किया गया था और पुरातात्विक महत्व के बौद्ध स्थल बड़े ही मनोयोग से फिल्माए गए थे, साथ ही प्राचीन अजंता की गुफाएं बहुत ही सजीवता के साथ प्रदर्शित की गई थी। इस पूरी फिल्म में बुद्धकालीन घटनाओं, स्थलों और चित्रों को दिखाने के साथ-साथ उसके इतिहास से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी को बताते हुए गर्वीले ढँग से स्वरबद्ध किया गया था। यह फिल्म सन 1957 के कान्स फिल्म समारोह में सम्मानित की गई थी।

‘गौतम दी बुद्धा’ के बनने के तीन वर्ष बाद प्रसिद्ध फिल्मकार विजय भट्ट के द्वारा सन 1960 में ‘अँगुलिमाल’ के नाम से बनी फिल्म भगवान् बुद्ध के जीवन वृत्त पर सीधे तो आधारित नहीं थी लेकिन उनके एक शिष्य अँगुलिमाल पर बनाई गई थी। जो गौतम बुद्ध का शिष्य बनने से पहले लूटपाट करता था और निर्दोष लोगों की हत्या करके उनकी अँगुली काटकर अपने गले में माला पहनता था। इस भयावह घटनाक्रम पर बनी इस फिल्म में जब गौतम बुद्ध जंगल से गुजर रहे होते हैं, तो उनका सामना उस कुख्यात डाकू अँगुलिमाल से होता है, जो बुद्ध के दया व करुणा भरे उपदेश सुनकर उनके पैरों में गिरकर माफी माँगने लगता है और बाद में उनका शिष्य बन जाता है। इस फिल्म के निर्देशक विजय भट्ट थे और संवाद भवानी प्रसाद मिश्रा ने लिखा। डाकू अँगुलिमाल का अभिनय भारत भूषण ने किया था, अन्य लोगों में निम्मी, अनीता गुहा, अचला सचदेवा, विनोद मेहरा, विमला कुमारी और हेलन आदि ने अभिनय किया था। जब सन 1962 में इस फिल्म को सिंहली भाषा में डब करके श्रीलंका में रिलीज किया गया था, तो यह फिल्म वहाँ सुपरहिट रही थी। दो घंटे चार मिनट की इस फिल्म का एक गाना आज भी सदाबहार है- ‘जब दुनिया से प्यार उठे, नफरत की दीवार उठे, माँ की ममता पर जिस दिन बेटे की तलवार उठे, धरती की काया काँपने, अंबर जगमग उठे डोल, तब मानव तू मुख से बोल, बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि’।

जापान में सन 1961 में जापानी फिल्म निर्माता ‘केंजी मिसुमी’ ने भगवान बुद्ध के जीवनवृत्त पर ‘सका’ नामक फिल्म बनाई, जो सन 1963 में अमेरिका में ‘बुद्धा’ नाम के साथ प्रदर्शित की गई। दक्षिणी कोरिया में सन 1964 में निर्माता-निर्देशक ‘इल्हो जोंग’ ने ‘सोकगामोनि’ के नाम से भगवान् बुद्ध के ऊपर फिल्म बनाई। यह फिल्म महायान बौद्ध संप्रदाय के ग्रंथों के आधार पर ऐतिहासिक रूप से बनाई गई थी। इस फिल्म का नाम ‘सोकगामोनि’ शब्द से अभिप्राय शाक्यमुनि बुद्ध से है।

भारत में सन 1966 में फिल्म निर्माता एफ.सी.मेहरा ने ‘आम्रपाली’ के नाम से फिल्म बनाई। यह फिल्म गौतम बुद्ध के जीवन पर सीधे आधारित तो नहीं थी, पर उनकी एक शिष्या वैशाली की नगरवधू देवी आम्रपाली के जीवन पर फिल्माई गई थी। इस फिल्म के निर्देशक ‘लेख टंडन’ थे और इसमें मुख्य भूमिकाएँ प्रसिद्ध अभिनेत्री वैजयंतीमाला, जाने-माने अभिनेता सुनील दत्त, प्रेमनाथ और रणवीर आदि लोग थे। यह फिल्म सुपरहिट रही थी। दो घंटे की इस फिल्म की कहानी ओमकार साहिब ने लिखी थी और संवाद अर्जुनदेव व बलवीर सिंह ने लिखे थे। जाने माने संगीतकार शंकर-जयकिशन ने संगीत दिया था और स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर ने हृदयस्पर्शी सदाबहार गाने गाए थे।

महान भारतीय फिल्मकार बिमल राय द्वारा वर्ष 1957 में निर्मित ‘गौतम दी बुद्धा’ नामक वृतचित्र बनाने के बाद दो और फिल्में – ‘अँगुलिमाल’ और ‘आम्रपाली’ के नाम से बनीं थीं, लेकिन इन दोनों फिल्मों का संबंध तथागत गौतम बुद्ध के जीवन चरित्र से सीधा नहीं था। इसलिए सन 1966 में ‘आम्रपाली’ फिल्म के सुपरहिट होने के बाद भारत सरकार ने अगले वर्ष 1967 में बिमल राय द्वारा निर्मित ‘गौतम दी बुद्धा’ नामक वृत्तचित्र को दोबारा पुनः रिलीज कर दिया। इस डॉक्यूमेंट्री फिल्म के लेखक व निर्देशक राजबंस खन्ना थे। काफी लंबे अंतराल के बाद सन 1989 में ‘बुद्धा’ के नाम से एक छोटी डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई गई थी, पर यह फिल्म किसी का भी ध्यान अपनी ओर नहीं खींच सकी।

इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत व दुनिया के अन्य देशों में सन साठ व सत्तर के दशक में ही अधिकतर फिल्में व डॉक्यूमेंट्री फिल्म भगवान बुद्ध के जीवन वृत्त पर बनाई गई थी। फिर वर्ष 1993 में प्रसिद्ध इटालियन फिल्म निर्माता-निर्देशक ‘बेर्नादो बेर्तोलुच्ची’ ने ‘लिटिल बुद्धा’ के नाम से भगवान बुद्ध के जीवनवृत्त पर एक छोटी फिल्म बनाई थी। यह फिल्म इटली, फ्रांस, ब्रिटेन और अन्य देशों में बहुत ही आकर्षण के साथ देखी गई।

भारतीय फिल्म निर्माता जी.ए.शेषागिरी राव ने सन 1997 में गौतम बुद्ध के जीवन चरित्र को व्यापक रूप से दिखाने के लिए ‘बुद्ध’ के नाम से एक लंबी धारावाहिक फिल्म बनाई, जो सिनेमा घरों में प्रदर्शित तो नहीं हुई लेकिन वह पाँच भागों में डी.वी.डी. कैसेट के रूप में खूब देखी गई। जिसमें प्रत्येक डी.वी.डी. 180 मिनट की थी और इस धारावाहिक फिल्म के निर्देशक पी.सी.रेड्डी थे। इसके चार साल बाद वर्ष 2001 में फ्रांसीसी फिल्म निर्माता ‘मार्टिन मेइस्सोन्निर’ ने बुद्ध के ऊपर ‘ला विया दी बोउद्धा’ नामक फिल्म बनाई, जो भारत में ‘लाइफ ऑफ बुद्धा’ के नाम से प्रदर्शित हुई। वर्ष 2004 में ‘दी लीजेंड ऑफ बुद्धा’ के नाम से टू डी एनीमेशन फिल्म बनाई गई। वर्ष 2007 में थाईलैंड के फिल्मकार ‘वाल्लापा फिम्तोंग’ ने ‘फरहा फुत्ताजाओ’ के नाम से भगवान बुद्ध के जीवन पर एक टू डी एनीमेशन फिल्म बनाई। वर्ष 2008 में भारत में तेलगू फिल्म निर्माता के.राजशेखर ने बुद्ध के जीवन वृत्त को दिखाने के लिए डी.वी.डी. कैसेट के आकार में ‘तथागत बुद्ध’ नाम से तेलगू में फिल्म बनाई। वर्ष 2011 में वियतनामी बौद्ध भिक्षु ‘तिक न्यात हन’ की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक ‘ओल्ड पाथ व्हाइट क्लाउड्स’ को आधार बनाकर फ्रांस के फिल्मकारों ने ‘बुद्धा’ के नाम से फिल्म का निर्माण किया। वर्ष 2011 में ही जापान के फिल्मकार ‘ओसामु तेजुका’ ने ‘बुद्धा’ नाम से एक एनीमेशन फिल्म सिरीज को तैयार किया।

यदि हम हाल-फिलहाल में गौतम बुद्ध पर बनी फिल्मों का अध्ययन करें तो पाते हैं कि इस वर्ष 2013 में कई देशों में भगवान बुद्ध के ऊपर फिल्में बनीं हैं जैसे नेपाल देश में ‘बुद्धा’ के नाम से एनीमेशन फिल्म ‘तुलसी घिमिरे’ ने बनाई है। श्रीलंका में भी गौतम बुद्ध के ऊपर ‘सिद्धार्थ दी बुद्धा’ के नाम से एनीमेशन फिल्म को निर्माता ‘समन वीरामन’ ने बनाया है। भारत में हाल ही में 08 सितंबर, 2013 से जी.टी.वी. पर जाने-माने उद्योगपति भूपेंद्र कुमार मोदी द्वारा निर्मित ‘बुद्ध’ नाम से एक धारावाहिक का प्रसारण शुरू किया गया है। इसके निर्देशक धर्मेश हैं और प्रसिद्ध अभिनेता कबीर बेदी, अमित बहल और अभिनेत्री निगार खान आदि अन्य लोग इसमें अभिनय कर रहे हैं। इसके अलावा वर्ष 2014 में भारत के फिल्म निर्माता, निर्देशक, फिल्म लेखक और डॉक्यूमेंट्री बनाने वाले ‘पान नलिन’ उर्फ नलिन कुमार पांडेय ने भगवान बुद्ध के जीवन चरित्र पर एक विशाल फिल्म ‘बुद्धारूदी इन्नर वारियर’ के नाम से बनाने की घोषणा की है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि भगवान् बुद्ध का धीर-गंभीर व शांत व्यक्तित्व हमेशा से दुनिया भर के कलाकारों व फिल्मकारों को आकर्षित करता रहा है। वे अपने-अपने ढँग से तथागत गौतम बुद्ध के जीवनवृत्त को फिल्माने का काम करते रहे हैं। गौतम बुद्ध के प्रति आकर्षण इस हद तक बढ़ा है कि छोटे-छोटे बच्चों के लिए बुद्ध पर पूरी दुनिया में एनीमेशन निर्माण करने वालों ने उन पर एनीमेशन फिल्में, कार्टून फिल्में तक बना डाली हैं क्योंकि भगवान बुद्ध सम्यक संबुद्ध हैं, वह विद्या और आचरण से युक्त हैं, लोगों को अच्छी गति देने वाले सुगत हैं, वह इस लोक का व्यवहार जानने वाले हैं और अज्ञानी लोगों को सन्मार्ग पर लाने वाले हैं। यही कारण है कि बुद्ध का अलौकिक व्यक्तित्व पूरी दुनिया के लिए जिज्ञासा व आकर्षण का सदैव केंद्र बना हुआ है।

(लेखक म.गां.अं.हि.वि., वर्धा के बौद्ध अध्ययन केंद्र में सहायक प्रोफेसर हैं)

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